आप से भाजपा: एक ऐतिहासिक दलबदल की कहानी
झाड़ू टूटी, कमल खिला
बुरहानपुर (न्यूज ढाबा)–24 अप्रैल 2026, शुक्रवार का दिन भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज हो गया, जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के 10 में से 7 सांसदों ने एक साथ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। (Uttarjan) यह सिर्फ एक दलबदल नहीं था — यह उस पार्टी का विघटन था जिसे कभी भ्रष्टाचार विरोध की आंधी पर सवार होकर सत्ता मिली थी।
कौन-कौन गए?
राघव चड्ढा के नेतृत्व में भाजपा में शामिल होने वालों में संदीप पाठक, अशोक कुमार मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी, स्वाति मालीवाल और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। (Rewa Riyasat)
ये नाम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं:
राघव चड्ढा — पार्टी के सबसे चमकते युवा चेहरे, राज्यसभा में पूर्व उप-नेता
संदीप पाठक — AAP के संगठनात्मक ढांचे के रीढ़ माने जाने वाले नेता
हरभजन सिंह — भारत के पूर्व क्रिकेट स्टार, जिन्होंने 2022 में AAP के टिकट पर राज्यसभा में प्रवेश किया था
अशोक मित्तल — लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक, जिन्हें हाल ही में AAP का राज्यसभा उप-नेता बनाया गया था
विक्रमजीत साहनी — पद्म श्री से सम्मानित उद्योगपति, सन ग्रुप के चेयरमैन
राजेंद्र गुप्ता — ट्राइडेंट ग्रुप के संस्थापक, उद्योग जगत के दिग्गज
स्वाति मालीवाल — जिनका केजरीवाल आवास-विवाद पहले से ही पार्टी में दरार का संकेत था
संवैधानिक चाल: दल-बदल कानून का कवच
राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया, “हमने फैसला किया है कि हम, राज्यसभा में AAP के 2/3 सदस्य, भारत के संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए खुद को बीजेपी में मिला लेंगे।” (AajTak)
संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता। AAP के 10 सांसदों में से 7 के जाने से उनकी सदस्यता सुरक्षित रहेगी। (Haribhoomi) यानी यह दलबदल नहीं, बल्कि “विलय” था — और यह पूरी तरह संवैधानिक रूप से वैध।
नेताओं ने क्या कहा?
राघव चड्ढा ने भारी मन से कहा कि आम आदमी पार्टी अपने उन आदर्शों और बुनियादी मूल्यों से पूरी तरह भटक गई है, जिनके लिए इसे बनाया गया था। उन्होंने कहा, “AAP को मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए।” (AajTak)
ED की कार्रवाई का साया भी इस घटनाक्रम पर मंडराता दिखा। अशोक कुमार मित्तल के जालंधर स्थित घर पर 15 अप्रैल को ED की छापेमारी हुई थी, और इस कार्रवाई के ठीक 10 दिन बाद उनका भाजपा में शामिल होना राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बन गया। (Rewa Riyasat)
AAP का पलटवार
AAP सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन को पत्र भेजकर इन सात सांसदों को अयोग्य घोषित करने का अनुरोध किया, यह तर्क देते हुए कि वे AAP की टिकट पर निर्वाचित हुए थे। (Dainik Tribune)
संजय सिंह ने आरोप लगाया कि इस तरह का दलबदल विशेष रूप से पंजाब में जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात है और संविधान की भावना के भी विरुद्ध है। (Dainik Tribune)
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इस घटनाक्रम से नाराज बताए जा रहे हैं और उन्होंने राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा है। (Uttamhindu)
राजनीतिक निहितार्थ
यह घटनाक्रम कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है:
AAP के लिए: पार्टी छोड़ने वाले सात सांसदों में से छह पंजाब से राज्यसभा सदस्य हैं। (Dainik Tribune) यानी पंजाब में जहाँ AAP की सरकार है, वहीं से पार्टी की संसदीय शक्ति का सफाया हो गया। राज्यसभा में अब AAP की आवाज़ महज तीन सांसदों तक सिमट गई है।
भाजपा के लिए: इस कदम ने राज्यसभा में भाजपा की ताकत को बड़ी मजबूती दी है। (Haribhoomi) संख्याबल के साथ-साथ इससे भाजपा को एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने का भी अवसर मिला।
निष्कर्ष: आम आदमी से आम राजनीति तक?
2011 के अन्ना आंदोलन से जन्मी AAP ने भ्रष्टाचार और परंपरागत राजनीतिक संस्कृति के विरुद्ध लड़ाई का बिगुल बजाया था। लेकिन 2026 में उसी पार्टी के सबसे वरिष्ठ सांसद यह कहते हुए पार्टी छोड़ रहे हैं कि वह “अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है।”
चाहे यह वैचारिक मतभेद हो, सत्ता का खेल हो, या दबाव की राजनीति — इतना तय है कि आम आदमी पार्टी के लिए यह सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल है। अब असली परीक्षा पंजाब के मतदाताओं की है, जिन्होंने AAP को भारी बहुमत दिया था — वे इस “विश्वासघात” को कैसे देखते हैं, यही आने वाले चुनावों में तय होगा।